Wednesday, December 10, 2014

बिजनेस

" क्या भैया ? कैसा रहा आज का बिजनेस ?"
मेरे सेक्टर के जस्ट बाहर ही एक बंदा गोलगप्पे टिकिया इत्यादि का ठेला लगता है. उसके साथ अच्छा व्यवहार बना हुआ है. आते जाते नमस्ते हो जाती है. कभी कभार उसके यहाँ खा भी लेता हूँ, कभी घर के लिए भी पैक करवा लेता हूँ. बंदा लगभग बराबर उम्र का ही है. फिर भी मैं उसे भैया बुलाता हूँ, वो भी मुझे भैया ही बुलाता है. कभी भी उसे आवाज़ लगाकर बिक्री करते नहीं देखा मैंने. 4 बजे आकर ठेला लगाता है और भीड़ अपने आप ही आती रहती है. पुष्प विहार सेक्टर 1 और उसके संलग्न इलाकों में चाट पसंद करने वाले काफी लोग हैं. वो बंदा अपन साथ एक लड़का और लाता है जो कि 6 बजे से 9 बजे तक के पीक टाइम में उसका हाथ बंटाता है. सही बंदा है वो. सेक्टर 1 में शिफ्ट होने के अगले दिन ही उसके यहाँ गोलगप्पे खाए थे मैंने. भीड़ कम थी तो थोड़ी बात चीत भी हुई. तभी से व्यवहार बन गया.
" क्या भैया ? कैसा रहा आज का बिजनेस ?" रात के सवा दस बज रहे थे मैं सेक्टर के अन्दर आ रहा था. उसे देखा तो ऐसे ही बात करने का मन हुआ. उसने अपने ठेले की लाइट ऑफ कर दी थी और सामान समेट रहा था.
"बस भैया. अभी कुछ दिन पहले तो काफी बिक्री हुई थी. आज थोडा मामला ठंडा रहा" वो मीठी सौंठ की चटनी को पतीले में डालते हुए बोला.
"अब हर दिन तो दिवाली नहीं हो सकती ना?" मैंने मज़ाक में कहा.
वो हंसा. उसका हेल्पर उबले हुए मटर और आलू को एक अलग पतीले में डाल रहा था. मैंने सोचा की चलो काम करने देता हूँ और अपने घर जाता हूँ. तभी एक बाइक आकर ठेले से थोड़ी दूरी पर रुकी. बन्दे ने पतीला रखा और बाइक की तरफ गया. कुछ बात चीत हुई. बन्दे ने पर्स से कुछ नोट निकाल कर दिए. बाइक वापिस स्टार्ट हुई और साकेत की तरफ बढ़ गयी.
बंदा लौट के आया. मुझे देखकर हल्का सा हंसा. उसकी हंसी में प्रसन्नता से शर्मिंदगी ज्यादा थी. मैं स्थिति को भांप गया था.
"हर हफ्ते आता है क्या ?" मैंने पुछा.
बंदा फिर से हंसा. और हाँ में सर हिलाया.
"साले इतना कमाते हैं फिर भी चैन नहीं है" मैंने धीमे स्वर में बोला.
"अब क्या करें भैया. हम भी तो सड़क के किनारे ही ठेला लगाते हैं. तो कुछ तो देना ही पड़ेगा". बन्दे ने भी धीमे आवाज़ में बोला.
"पर इनको क्यूँ? ये कौन होते हैं लेने वाले" मैं काफी खीझ रहा था. ये बंदा कितनी मेहनत करके कमाता है वो मैं रोज़ देखता था. और एक आदमी बाइक पर आकर एक हिस्सा ले जाता है.
"भैय्या अब देखो. कानून के हिसाब से तो सड़क खाली ही रहनी चाहिए. इन लोगों का काम है सड़क खाली रखवाना. लेकिन हमारी पास भी तो इतना पैसा नहीं है कि हम दूकान लें या माल में ठेला लगायें. तो हमें भी गुज़ारा करना है. अब इसके एवज़ में अगर कुछ देकर काम हो जाए तो क्या बुराई है."
मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ये आदमी पैसे लेने वाली बात को जस्टिफाई कर रहा था. "पर ये तो भ्रष्टाचार हुआ ना ? तुम इसको जो दे रहे हो , वो इसका कला धन हुआ ना?"
"भैया देखो. मुझे ये सब बातें नहीं पता. मुझे इतना पता है कि सड़क के किनारे ठेला लगाना कानूनी तौर पर ठीक नहीं है. मैं कानून तोड़ रहा हूँ इस वक़्त. पर कानून तोड़े बिना मैं गुज़ारा नहीं चला पाउँगा. ये जो लेकर गया उसे जुर्माना समझ लो. अगर दूकान लगता तो उसका भी किराया देता ही ना?"
उसकी बातें ठीक थी. बंदा कोई बहुत बड़ा करप्शन नहीं कर रहा था. जो वो कर रहा था वो उसके जीने के लिए ज़रूरी था. ऐसे कितने ही लोग हैं जो दूकान नहीं लगा सकते , उनको ठेला ही लगाना पड़ता है. हाँ उनकी इस स्थिथि का गलत फैदा उठाया जाता है लेकिन समाधान क्या है ??? या तो ये चलने दो या फिर उनको जीविका निर्वाहन का कोई दूसरा उपाय दो. मैं और कुछ न बोल सका.
"क्या कहूँ भैया? बात तो तुम्हारी भी ठीक है. चलो, फिर कल मिलते हैं. गुड नाईट"
"अच्छा भैया."
घर तक चलते चलते सोचा काला धन, भ्रष्टचार. देश का विकास ये सब बातें भरे पेट ही अच्छी लगती है.
पुनश्च : मैं किसी भी प्रकार के घूस, हफ्ता , वसूली, भ्रष्टाचार का कड़ा विरोधी हूँ(क्युकी मैंने थोड़ी देर पहले ही रात्री भोजन किया है !!) . और ये कहानी (कानूनी और सुरक्षा वजहों से) भी काल्पनिक ही समझी जाए. !

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