Wednesday, December 10, 2014

स्वच्छ भारत और 5 च्युइंग गम


जब से आइ.आइ.टी के कैंटीन में थाली की कीमत 45 रूपए से बढाकर 60 रूपए (with permission from concerned authority :P) कर दिया गया है, तब से मैं ज्यादातर बाहर ही खाता हूँ. आइ.आइ.टी के मेन गेट के उस पार SDA मार्किट में 'लिटिल पंजाब' नाम से एक छोटी सी दूकान है. वहां खाना बढ़िया मिलता है. स्वाद तो गज़ब है ही, क्वांटिटी भी ठीक है, और जो भैया हैं उनके साथ व्यवहार भी बहुत अच्छा बना हुआ है.
राजमा चावल, कढ़ी चावल, छोले चावल सब 50 रूपए में मिलते हैं. पनीर चवल भी है जो कि 60 रूपए का है. सब एक दम फ्रेश बना हुआ मिलता है. खैर उनके बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूंगा. जो पॉइंट है, वो ये है की वो चावल के साथ कच्चा प्याज देते हैं. जिससे कि स्वाद और निखर के आता है. पर जैसा कि सब लोग जानते हैं कि कच्चा प्याज़ा खाने के बाद कुछ मुख-शुद्धि की आवश्यकता होती है. तो मुख की शुद्धि के लिए मैं वहीँ SDA मार्किट में एक खोपचे से च्युइंग गम खरीदता हूँ. ये लेख उन्ही च्युइंग गम के बारे में है. अगर आप सोच रहे हैं कि मैंने इतनी बड़ी भूमिका क्यूँ बनायीं, तो इसका श्रेय मैं UPTU को देना चाहूँगा और वैसे भी आप तो जानते ही हैं कि क्रिएटिव फ्रीडम भी कोई चीज़ होती है.
खैर....
आज कॉलेज से जल्दी घर आ गया था. सोचा लंच करके ही घर आता हूँ क्युकी मम्मी को बोलकर गया था कि मध्यान्ह भोज बाहर ही करूँगा तो घर में अगर बिना खाए आता तो बिस्कुट से ही काम चलन पड़ता. इसलिए लिटिल पंजाब चला गया. कढ़ी चावल खाया. आज थोडा अमीर महसूस कर रहा था तो मीठी लस्सी भी पी ली. फिर भैया को "ठीक है भैया, चलते हैं" बोलकर बाहर की ओर चल दिया. रास्ते में एक खोपचे से 5 सेण्टर फ्रेश खरीदी. सोचा च्युइंग गम को चिउ करते करते घर पहुँच जाऊंगा.
SDA के बाहर कई ऑटो खड़े थे, लेकिन जैसा कि उनका धर्म था, उनमे से कोई भी पुष्प विहार तक आने के लिए राज़ी नहीं हुआ. किसी के पास सवारी थी, तो किसी के पास तेल नहीं था, तो किसी के पास बहाना बनाने की भी इच्छा नहीं थी. तो मैंने सोचा बहुत किया सम्मान और बस स्टैंड की तरफ बढ़ गया. नज़दीक ही है बस स्टैंड भी.
मैंने पहले च्युइंग गम का रेपर खोला और चबाने लगा और बस का इंतज़ार करने लगा. रेपर मैंने फेंका नहीं, क्युकी ये मेरी आदत है कि जब च्वेंग गम ख़तम हो जाए तो उसको रेपर में लपेट के फेंकता हूँ. इससे उसके निष्पादन में आसानी होती है. 764 नंबर की बस आई और मैं उसपे चढ़ गया. भीड़ ज्यादा नहीं थी. एक तो शनिवार, ऊपर से दोपहर का टाइम. च्युइंग गम चबाये जा रहा था. लगभग 5 मिनट में हौज़ खास मेट्रो तक पहुँच गया. उतर तो लगा की च्युइंग गम का स्वाद ख़तम हो गया है. तो फेंकने के लिए कूड़े-दान ढूँढने लगा. लेकिन बस स्टैंड से लेकर मेट्रो के गेट तक जाने वाले रास्ते में एक भी कूड़े दान नहीं दिखाई दिया. हाँ, मैं मानता हूँ कि मैंने ज्यादा इधर उधर देखा भी नहीं. लेकिन कुद्दे-दान है कोई खजाना नहीं कि छुपा के रकः जाए. सोचा चबाते चलता हूँ. फिर देखा कि एक आदमी सीढ़ियों पे झाड़ू लगा रहा है. एक हाथ में झाड़ू दुसरे में छोटा कूड़े दान है. मैंने पुछा " भैया च्युइंग डाल दूँ इस डस्टबिन में?"
बंदा अच्छा था बोला ठीक है. रेपर में च्युइंग गम को लपेटकर डस्टबिन में डालके मैं आगे बढ़ा.
दूसरा च्युइंग गम मैंने मेट्रो के अन्दर जाकर खोला. रेपर को यथापूर्वक मैंने जेब में रख लिया. एक आंटी मेरे को घूर के देख रही थी. शायद सोच रही होंगी मैं मोदी जा काफी बड़ा पंखा हूँ. वैसे भी मेरे तिलक को देख कर कई लोग मुझे शिव-सेना या फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आदमी समझते हैं. पर मैं आंटी को कैसे बताता कि ये आदत मेरे को बहुत बचपन में मेरे मामाजी ने डलवाई थी. कि च्युइंग गम को रेपर में लपेट कर फेंकने से कूड़ा उठाने वाले को आसानी होती है, नहीं तो कुछ कूड़ा च्युइंग गम से चिपक जाता है और उसे कुरेद के निकालना पड़ता है. ये तब की बात है जब लोग दुनिया को सुधारने के बजाय खुद को और अपने छोटों को सुधारते थे. आज कल का फैशन तो कुछ और है. खैर...
मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन आ गया. दुसरे च्युइंग गम का स्वाद भी अब कड़वा लगने लगा था. मैं मेट्रो परिसर में कूड़े दान ढूँढने लगा. पर घंटा एक भी डस्ट बिन नहीं मिला. बाहर आया तो ऑटो वाले हल्ला मचाये थे ... शेख सराय...शेख सराय...शेख सराय...माँल...माँल..माँल...
मैं ऑटो में बैठ गया.
अगली रेड लाइट से मेरे घर तक का रास्ता नेट 1 किलोमीटर का था. अब च्युइंग गम चबाया भी नहीं जा रहा था. मैंने एक पान वाले के पास रखे कूड़े दान में च्युइंग गम को डाल दिया रेपर में लपेट कर.
तीसरा च्युइंग गम खोला. और हैडफ़ोन पर गाने सुनते हुए आगे बढ़ा. पेट्रोल पंप क्रॉस किया, माँल वाला कट क्रॉस किया. अब च्युइंग गम को फेंकने की ज़रूरत महसूस हुई पर कहीं भी कूड़े दान नहीं था. थोड़ा और आगे बढ़ा फिर भी नहीं दिखा. थोड़ी दूरी पर एक जगह कुछ कूड़ा डला हुआ था. हालांकि वो कूड़ा डालने की जगह थी नहीं. फिर भी ढेर लगा के रखा था. एक बार तो सोचा चलता रहूँ फिर रहा नहीं गया तो उसी ढेर में अपना च्युइंग गम भी डाल दिया.
चौथा च्युइंग गम निकाला और चबाते चबाते घर तक पहुँच गया. काश नेता गण फोटो खिंचवाने के बाद कुछ कूड़े दानों की व्यवस्था करते, तो शायद स्वच्छ भारत अभियान को बल मिलता. खैर, पांचवा च्युइंग गम THOR देखते देखते घर में बैठ कर ख़तम किया.

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