Wednesday, August 14, 2019

तो बस... ख़तम

पिछले शुक्रवार को मैं मर गया. हाँ. 

अरे इसमें घबराने वाली बात नहीं है. सो रहा था. लगभग पौ फटते समय दिल ने कहा अब तो मैं थक  गया. अब बस. 

तो बस...ख़तम. 

एक तरह से अच्छा ही हुआ कि सोते सोते चला गया. न खुद परेशान हुआ ना किसी और को परेशान किया. 
लेकिन इंसान के चले जाने के बाद जो नीचे रह गए उनको तो परेशानी होती ही है. 

सो मेरेको नहीं. मेरे घरवालों को हुई. 

बेटे को ऑफिस छोड़ना पड़ा. शुरूआती दुःख के बाद उसका झल्लाना स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए. कहाँ से ये लोड आ गया. वैसे ही काम का इतना प्रेशर था. अब अंतिम संस्कार, मुंडन, श्राद्ध. दुनिया भर का काम. काश एक ऐसा service provider होता, Make My Antim Sanskaar टाइप्स. उसमें बूकंग करके खुद ही सब निपटाकर जाता. लेकिन ऐसी कोई सुविधा नहीं है. जो युवा नीचे रह गए उनके लिए एक सही बिज़नस आईडिया देते हुए जा रहा हूँ.
नहीं मुझे कोई stakes नहीं चाहिए कंपनी में. 

पड़ोसी भी थोड़े विरक्त हुए. ये सरकारी नौकरी वाले शुक्रवार को ही चले जाते हैं क्या ?? जब जिंदा थे तब शुक्रवार की छुट्टी लेकर weekend लम्बी कर लेते थे, और जब जाना हुआ तो उसमे भी friday. अब अर्थी को कन्धा देना पड़ेगा. दिवंगत के परिवार को दिलासा देना, हौंसला बंधाना इत्यादि एवं इत्यादि. और देखा जाए तो पड़ोसी मेरेसे उतना ज्यादा प्रेम करते भी नहीं थे. आते जाते नमस्कार, कैसे हैं ?जिंदा हैं. बस इतना ही. लेकिन लोक लज्जा भी कोई चीज़ है. इसलिए मेरे जाने पर पड़ोसी शोक प्रकट करने आयेंगे. 
तो आयें. 

काम वाली बाई भी झुंझलाई. अब जो लोग हौंसला बढाने आयेंगे उनको चाय पानी बिस्कुट वगेरह तो देना ही पड़ेगा. बर्तन बढ़ेंगे. शाम तक घर रिश्तेदारों से भर जायेगा. उनके बर्तन अलग. और भी कई सारे घर करने होते हैं उसको. भक्क यार. ये बुड्ढा भी एक दिन रुक कर नहीं मर सकता था क्या ??? शनिवार  और रविवार को एक घर कम करना पढ़ता है उसको, क्युकी उस घर के भैया  weekend में अपने गाँव चले जाते हैं. 
खैर.

मेरे जाने का सबसे ज्यादा दुख शायद बिल्डिंग के नीचे घूमने वाले आवारा कुत्तों को हुआ. उनको रोज़ रोटी खिलाना वाला इंसान चला गया था. सब एक जुट होकर भौऊऊऊऊऊ की आवाज़ निकाल रहे थे. शायद मेरे जाने के दुःख में.

वो आवाज़ सुनकर मेरी नींद टूटी.
सुबह हो गयी थी. शुक्रवार का दिन था. ऑफिस जाना था. संसार से मुक्ति मिलने में अभी टाइम था.

अगला दिन weekend है सोचकर खुश होता हुआ मैं बिस्तर से उठा.



Sunday, August 4, 2019

आग


बात ये नहीं थी की मंदिर में आग क्यों लगायी. बात ये थी की मंदिर में आग तो लगायी थी. अब मंदिर में लगी आग पूरे शहर में फैलेगी ये तो जग जाहिर ही हुआ ना ?

लेकिन उस समय उसको ये कहाँ पता था. उस समय तो वो अपने दुःख के अन्धकार में अंधे की तरह भटक रहा था. शरीर नहीं, शरीर तो एक ही जगह बैठा हुआ था और एक टक फर्श पर नज़र जमाये हुए था. मन भटक रहा था उसका. अपने परिवार के साथ बिताया हुआ एक-एक पल याद आ रहा थे, और पता नहीं क्यों सभी में वो सब लोग खुश थे. उनके चेहरे की मुस्कान उसके दुःख के अन्धकार को और भी घना कर रही थी.

सफ़ेद चादर में लिपटी दो लाशें घर के सामने अहाते में रखी हुई थीं. घर में रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी, शुभ चिन्तक सभी आ जा रहे थे. कई लोग उसके पास आकर उसे सांत्वना भी दे रहे थे. वो बस हाँ में सर हिला रहा था. बिना नज़र उठाये. सुनाई कुछ भी नहीं दे रहा था फिर भी लौकिकता कर रहा था. अभी तो अंतिम संस्कार भी करना था. पूरी ज़िन्दगी वो और उसका परिवार भगवान् को मानता आया था, लेकिन फिर भी आज ये हुआ कि वो रह गया और उसकी पत्नी और उनकी छोटी बच्ची दोनों चले गए. धर्म, समाज, लौकिकता, भगवान् सबके प्रति use मन में एक तीव्र गुस्सा उबल रहा था.

दुःख के अन्धकार में कहीं दूर से उसे एक आग की झलक दिखाई दे रही थी.

रात होते होते, दाह कार्य हो जाने के बाद जब घर खाली हो गया था, वो आग और नज़दीक आ गया था और उबलता लावा बन चुका था. पहले उसने अपने घर का मंदिर जलाया, फिर हाथ में जलता हुआ कपडा लेकर बदहवास घर से निकला और गली के बाहर वाले मंदिर की तरफ बड़ा.

अगले दिन पूरा शहर जल रहा था. मंदिर जला तो लोगों के धर्म पर आंच आई. उन्होंने मस्जिद को आग लगाना चाहा. हाथापाई हुई. दूकान जले, गाड़ियां जलीं. लोग घयाल हुए. मरे. कर्फ्यू लगा.

वो अभी भी दीवार से टिका अपने घर में बैठा हुआ था और एक टक फर्श को देख रहा था. उसे पता नहीं था 20 नींद की गोलियां कितनी देर में अपना काम करती हैं. उसके हाथ में अभी भी वो अध् जला कपड़ा और जेब में माचिस का पैकेट था. वो उसे लेकर ही ऊपर जाना चाहता था. शायद पूछना चाहता था भगवान् से ऐसा क्यूँ किया. अगर ठीक जवाब नहीं मिला तो शायद........

लगभग 10 मिनट बाद वो लुढ़क कर फर्श पर गिर गया.