पिछले शुक्रवार को मैं मर गया. हाँ.
अरे इसमें घबराने वाली बात नहीं है. सो रहा था. लगभग पौ फटते समय दिल ने कहा अब तो मैं थक गया. अब बस.
तो बस...ख़तम.
एक तरह से अच्छा ही हुआ कि सोते सोते चला गया. न खुद परेशान हुआ ना किसी और को परेशान किया.
लेकिन इंसान के चले जाने के बाद जो नीचे रह गए उनको तो परेशानी होती ही है.
सो मेरेको नहीं. मेरे घरवालों को हुई.
बेटे को ऑफिस छोड़ना पड़ा. शुरूआती दुःख के बाद उसका झल्लाना स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए. कहाँ से ये लोड आ गया. वैसे ही काम का इतना प्रेशर था. अब अंतिम संस्कार, मुंडन, श्राद्ध. दुनिया भर का काम. काश एक ऐसा service provider होता, Make My Antim Sanskaar टाइप्स. उसमें बूकंग करके खुद ही सब निपटाकर जाता. लेकिन ऐसी कोई सुविधा नहीं है. जो युवा नीचे रह गए उनके लिए एक सही बिज़नस आईडिया देते हुए जा रहा हूँ.
नहीं मुझे कोई stakes नहीं चाहिए कंपनी में.
पड़ोसी भी थोड़े विरक्त हुए. ये सरकारी नौकरी वाले शुक्रवार को ही चले जाते हैं क्या ?? जब जिंदा थे तब शुक्रवार की छुट्टी लेकर weekend लम्बी कर लेते थे, और जब जाना हुआ तो उसमे भी friday. अब अर्थी को कन्धा देना पड़ेगा. दिवंगत के परिवार को दिलासा देना, हौंसला बंधाना इत्यादि एवं इत्यादि. और देखा जाए तो पड़ोसी मेरेसे उतना ज्यादा प्रेम करते भी नहीं थे. आते जाते नमस्कार, कैसे हैं ?जिंदा हैं. बस इतना ही. लेकिन लोक लज्जा भी कोई चीज़ है. इसलिए मेरे जाने पर पड़ोसी शोक प्रकट करने आयेंगे.
तो आयें.
काम वाली बाई भी झुंझलाई. अब जो लोग हौंसला बढाने आयेंगे उनको चाय पानी बिस्कुट वगेरह तो देना ही पड़ेगा. बर्तन बढ़ेंगे. शाम तक घर रिश्तेदारों से भर जायेगा. उनके बर्तन अलग. और भी कई सारे घर करने होते हैं उसको. भक्क यार. ये बुड्ढा भी एक दिन रुक कर नहीं मर सकता था क्या ??? शनिवार और रविवार को एक घर कम करना पढ़ता है उसको, क्युकी उस घर के भैया weekend में अपने गाँव चले जाते हैं.
खैर.
मेरे जाने का सबसे ज्यादा दुख शायद बिल्डिंग के नीचे घूमने वाले आवारा कुत्तों को हुआ. उनको रोज़ रोटी खिलाना वाला इंसान चला गया था. सब एक जुट होकर भौऊऊऊऊऊ की आवाज़ निकाल रहे थे. शायद मेरे जाने के दुःख में.
वो आवाज़ सुनकर मेरी नींद टूटी.
सुबह हो गयी थी. शुक्रवार का दिन था. ऑफिस जाना था. संसार से मुक्ति मिलने में अभी टाइम था.
अगला दिन weekend है सोचकर खुश होता हुआ मैं बिस्तर से उठा.
अरे इसमें घबराने वाली बात नहीं है. सो रहा था. लगभग पौ फटते समय दिल ने कहा अब तो मैं थक गया. अब बस.
तो बस...ख़तम.
एक तरह से अच्छा ही हुआ कि सोते सोते चला गया. न खुद परेशान हुआ ना किसी और को परेशान किया.
लेकिन इंसान के चले जाने के बाद जो नीचे रह गए उनको तो परेशानी होती ही है.
सो मेरेको नहीं. मेरे घरवालों को हुई.
बेटे को ऑफिस छोड़ना पड़ा. शुरूआती दुःख के बाद उसका झल्लाना स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए. कहाँ से ये लोड आ गया. वैसे ही काम का इतना प्रेशर था. अब अंतिम संस्कार, मुंडन, श्राद्ध. दुनिया भर का काम. काश एक ऐसा service provider होता, Make My Antim Sanskaar टाइप्स. उसमें बूकंग करके खुद ही सब निपटाकर जाता. लेकिन ऐसी कोई सुविधा नहीं है. जो युवा नीचे रह गए उनके लिए एक सही बिज़नस आईडिया देते हुए जा रहा हूँ.
नहीं मुझे कोई stakes नहीं चाहिए कंपनी में.
पड़ोसी भी थोड़े विरक्त हुए. ये सरकारी नौकरी वाले शुक्रवार को ही चले जाते हैं क्या ?? जब जिंदा थे तब शुक्रवार की छुट्टी लेकर weekend लम्बी कर लेते थे, और जब जाना हुआ तो उसमे भी friday. अब अर्थी को कन्धा देना पड़ेगा. दिवंगत के परिवार को दिलासा देना, हौंसला बंधाना इत्यादि एवं इत्यादि. और देखा जाए तो पड़ोसी मेरेसे उतना ज्यादा प्रेम करते भी नहीं थे. आते जाते नमस्कार, कैसे हैं ?जिंदा हैं. बस इतना ही. लेकिन लोक लज्जा भी कोई चीज़ है. इसलिए मेरे जाने पर पड़ोसी शोक प्रकट करने आयेंगे.
तो आयें.
काम वाली बाई भी झुंझलाई. अब जो लोग हौंसला बढाने आयेंगे उनको चाय पानी बिस्कुट वगेरह तो देना ही पड़ेगा. बर्तन बढ़ेंगे. शाम तक घर रिश्तेदारों से भर जायेगा. उनके बर्तन अलग. और भी कई सारे घर करने होते हैं उसको. भक्क यार. ये बुड्ढा भी एक दिन रुक कर नहीं मर सकता था क्या ??? शनिवार और रविवार को एक घर कम करना पढ़ता है उसको, क्युकी उस घर के भैया weekend में अपने गाँव चले जाते हैं.
खैर.
मेरे जाने का सबसे ज्यादा दुख शायद बिल्डिंग के नीचे घूमने वाले आवारा कुत्तों को हुआ. उनको रोज़ रोटी खिलाना वाला इंसान चला गया था. सब एक जुट होकर भौऊऊऊऊऊ की आवाज़ निकाल रहे थे. शायद मेरे जाने के दुःख में.
वो आवाज़ सुनकर मेरी नींद टूटी.
सुबह हो गयी थी. शुक्रवार का दिन था. ऑफिस जाना था. संसार से मुक्ति मिलने में अभी टाइम था.
अगला दिन weekend है सोचकर खुश होता हुआ मैं बिस्तर से उठा.