हम बड़े ही भाग्यशाली हैं. हमें पता है की आज हम अपने बिस्तर पर सोयेंगे. कल सुबह उठकर अपने घर के ड्राइंग रूम में रखे टी.वी. के सामने बैठ कर नाश्ता करके कॉलेज/ऑफिस जाएँगे. लौट कर अगर गर्मी ज्यादा हो तो शाम को थोड़ी देर बालकनी में बैठेंगे. रात को खाना खाकर शयन कक्ष के अपने चिर-परिचित बिस्तर पर वापिस सो जाएँगे.
क्या चलता होगा उन लोगों के मन में जिन्हें ये नहीं पता कि कब उनका घर , उनका नहीं रहेगा.
कहते हैं एक मध्यवित्त आदमी की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अपना खुद का घर पाने की होती है. कितना खुश हुआ होगा वो आदमी जब उसने अपना खुद का फ्लैट खरीदा होगा. शायद गृह प्रवेश से पहले उसने हवन भी करवाया होगा. शायद पड़ोसियों को भी बुलाया हो, और इसी बहाने नए पड़ोसियों से मेल मिलाप बढाया होगा. पडोस के बच्चों के साथ अपने बच्चों को खेलते देख, पड़ोस की महिलायों के साथ अपने पत्नी को बात चीत करते देख, खुद को पड़ोस के आदमियों के साथ राजनीति, खेल , बिज़नस इत्यादि की चर्चा करते देख, अपने फ्लैट के बाहर अपने नाम का नेम-प्लेट देख, उस आदमी ने सोचा होगा की उसने अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि पा ली.
क्या चला होगा उस आदमी के मन मे जब उसे पता चला कि ये फ्लैट जिसको उसने घर बनाया, वो अवैध है. कि एक बिल्डर ने उसे झांसे देकर उसके जीवन भर की कमाई लूट ली है. शायद उसे ये लगा होगा की ये सब एक बहुत बड़ी गलती है. 230 परिवार एक साथ इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकते हैं. ? जब ये फ्लैट्स बन रहे थे जब वो सामन लेके शिफ्ट हुआ था, जब वो पिछले 25 सालों से यहाँ रह रहा था, किसी ने तो कुछ नहीं कहा. फिर अचानक उसका फ्लैट अवैध कैसे हो गया ?
क्या सोचा होगा उस आदमी ने जब उसे पता चला कि उसे ये फ्लैट छोडके जाना होगा क्युकी ये गिराई जाएगी. ये फ्लैट जो कि उसका घर है, जिसके एक-एक कोण , एक-एक ईंट से वो परिचित है. न सिर्फ उसकी दिनचर्या, उसकी आदतें बल्कि उसका पूरा जीवन इस घर पे आधारित है, वो फ्लैट गिरा दिया जाएगा.
क्या सोचता होगा वो आदमी जिसे ये नहीं पता कि इस फ्लैट को खाली करके वो कहाँ जाए. जिसके पास इतने पैसे नहीं कि वो एक और फ्लैट खरीद सके. अपने घर के सामान को देख कर शायद उसका पहला ख़याल यही होगा कि इतना सारा सामन वो रखेगा कहाँ ? वो टेबल, सोफे जो कि कल तक उसके जीवन की आवश्यकताओं में हुआ करती थी वो आज उसे शायद बोझ लग रही होंगी. जब अपना घर ढहने की बात हो रही हो तो क्या वो आदमी अपने काम में मन लगा पा रहा होगा. ? जिस आदमी के सर की छत छिनने वाली हो, वो आदमी खा भी कैसे पा रहा होगा? कितनी रातें वो बिना नींद के बालकोनी में बैठा रहा होगा.
घर खाली करने की अवधि जब समाप्त हो गयी तब वो आदमी कितना डरा होगा, कि न जाने कब बुलडोज़र आ जाएँगे और उसका घर गिरा देंगे. घर चलाने के लिए वो आदमी ऑफिस तो जाता होगा लेकिन शायद हर एक घंटे के बाद शायद अपने पत्नी को फ़ोन करता होगा, कि सब ठीक है ना?
क्या सोचा होगा उस आदमी ने कल रात भर, जब उसे ये पता था कि बड़ी हुई अवधि भी आज ख़तम हो गयी. सुबह से वो सहमा रहा होगा. क्या उसने अपना सामन बाँधा होगा? या फिर सब भगवान् भरोसे छोड़कर वो अपने घर के साथ ही ढहने के लिए तैयार बैठा होगा?
क्या सोच रहा होगा वो आदमी आज की रात, जब उसे ये पता चला कि मंगलवार को उसके बिल्डिंग की बिजली और पानी की सप्लाई काट दी जाएगी. और उसे अपना घर खाली करना ही पड़ेगा. शायद आज की रात फिर वो जगा ही रहेगा. न जाने कितनी रातें वो ऐसे ही जागता आया है और न जाने आगे कितनी रातें उसे और जागनी हैं. भगवान किसी को ऐसा दिन न दिखाए की उसे अपने घर के ढहाए जाने का डर लगा रहे.
हम बड़े ही भाग्यशाली हैं. ये लेख मैं अपने बिस्तर पर बैठकर लिख रहा हूँ. थोड़ी देर बाद इसी बिस्तर पर ही सोऊंगा. भगवान ने चाहा तो कल भी इसी घर में रहूँगा, अगले हफ़्ते भी, आगे भी. कोई इसे ढहाने नहीं आएगा. उम्मीद है की आप सब भी ऐसे ही किसी घर में बैठे इसे पढ़ रहे हैं.
सर के ऊपर एक स्थायी छत होना...बड़े ही किस्मत की बात है. शायद इतनी कि हम समझ भी न पाएं.