बात ये नहीं थी
की मंदिर में आग क्यों लगायी. बात ये थी की मंदिर में आग तो लगायी थी. अब मंदिर
में लगी आग पूरे शहर में फैलेगी ये तो जग जाहिर ही हुआ ना ?
लेकिन उस समय
उसको ये कहाँ पता था. उस समय तो वो अपने दुःख के अन्धकार में अंधे की तरह भटक रहा था.
शरीर नहीं, शरीर तो एक ही जगह बैठा हुआ था और एक टक फर्श पर नज़र जमाये हुए था. मन
भटक रहा था उसका. अपने परिवार के साथ बिताया हुआ एक-एक पल याद आ रहा थे, और पता
नहीं क्यों सभी में वो सब लोग खुश थे. उनके चेहरे की मुस्कान उसके दुःख के अन्धकार
को और भी घना कर रही थी.
सफ़ेद चादर में
लिपटी दो लाशें घर के सामने अहाते में रखी हुई थीं. घर में रिश्तेदार, दोस्त,
पड़ोसी, शुभ चिन्तक सभी आ जा रहे थे. कई लोग उसके पास आकर उसे सांत्वना भी दे रहे
थे. वो बस हाँ में सर हिला रहा था. बिना नज़र उठाये. सुनाई कुछ भी नहीं दे रहा था फिर
भी लौकिकता कर रहा था. अभी तो अंतिम संस्कार भी करना था. पूरी ज़िन्दगी वो और उसका
परिवार भगवान् को मानता आया था, लेकिन फिर भी आज ये हुआ कि वो रह गया और उसकी
पत्नी और उनकी छोटी बच्ची दोनों चले गए. धर्म, समाज, लौकिकता, भगवान् सबके प्रति
use मन में एक तीव्र गुस्सा उबल रहा था.
दुःख के अन्धकार में
कहीं दूर से उसे एक आग की झलक दिखाई दे रही थी.
रात होते होते, दाह
कार्य हो जाने के बाद जब घर खाली हो गया था, वो आग और नज़दीक आ गया था और उबलता
लावा बन चुका था. पहले उसने अपने घर का मंदिर जलाया, फिर हाथ में जलता हुआ कपडा
लेकर बदहवास घर से निकला और गली के बाहर वाले मंदिर की तरफ बड़ा.
अगले दिन पूरा
शहर जल रहा था. मंदिर जला तो लोगों के धर्म पर आंच आई. उन्होंने मस्जिद को आग
लगाना चाहा. हाथापाई हुई. दूकान जले, गाड़ियां जलीं. लोग घयाल हुए. मरे. कर्फ्यू
लगा.
वो अभी भी दीवार
से टिका अपने घर में बैठा हुआ था और एक टक फर्श को देख रहा था. उसे पता नहीं था 20
नींद की गोलियां कितनी देर में अपना काम करती हैं. उसके हाथ में अभी भी वो अध् जला
कपड़ा और जेब में माचिस का पैकेट था. वो उसे लेकर ही ऊपर जाना चाहता था. शायद पूछना
चाहता था भगवान् से ऐसा क्यूँ किया. अगर ठीक जवाब नहीं मिला तो शायद........
लगभग 10 मिनट बाद
वो लुढ़क कर फर्श पर गिर गया.
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