Monday, October 6, 2014

विसर्जन



दशमी का दिन बहुत ही उदासी भरा होता है. मानों एक लम्भी छुट्टी के बाद काम पर जाने वाला दिन हो, या फिर एक लम्बा चलने वाले एग्जाम का पहला दिन हो. माहौल ग़मगीन हो जाता है दुर्गा माँ के चले जाने पर. पर उससे भी ज्यादा शायद इस बात पर कि ये जो मस्ती भरे कुछ दिन कटे थे वो अगले साल से पहले फिर नहीं आएँगे.
प्रतिमा का विसर्जन भी अपने आप में एक बड़ी चीज़ होती है. ट्रक का बंदोबस्त किया जाता है. महिलाएं आपस में सिन्दूर से होली खेलती हैं, दोल वगेरह आते हैं, लड़के और बच्चे बढ़िया नाचते हैं. और बड़े ही धूम धाम से माँ को विदा किया जाता है.

"पानी से दूर रहना और बुम्बा के साथ ही रहना". शोंटू के मम्मी ने उसे अपने बड़े भाई के साथ रहने और पानी से दूर रहने की हिदायत दी. ये हिदायत वो सुबह से 4-5 बार दे चुकी थी. शोंटू था तो १२ साल का लेकिन इस साल उसने विसर्जन में जाने की ज़िद पकड़ी हुई थी. शोंटू के मम्मी ने उसके बड़े भाई सायंतन (जिसको प्यार से बुम्बा बुलाते थे) को उसका ध्यान रखने के लिए कहा था. कहीं विसर्जन के धूम धाम और नाचें के चक्कर में छोटे भाई को भूल न जाए. बुम्बा उतना गैर-ज़िम्मेदार भी नहीं था.

मंडप से प्रतिमा निकली. लोगों में उत्साह तो था पर कहीं न कहीं दुःख भी था. ट्रक में प्रतिमा को चदे गया और फिर ट्रक नदी की ओर निकल चला. धाक ओर कांसा बजाय गया और बड़े ही भव्य तरीके से जुलुस मोहोल्ले से निकला. मैं रोड में आने के बाद एस पास चलाने वाले लोग रुक गए और हाथ जोड़कर माँ को आशीर्वाद बनाये रखने की अपील के साथ ही जुलुस से हट गए. शोंटू, बुम्बा और भी दूसरे लड़के खुली ट्रक में बैठकर "आसचे बोछोर आबार होबे" (अगले साल फिर से होगा) के नारे के साथ आगे बढे.

नदी के आस पास काफी भीड़ थी, और भी कई मोहोल्लों से प्रतिमाएं लायी गयी थी विसर्जन के लिए. बुम्बा ने शोंटू को उसके साथ ही रहें के लिये बोला. फिर प्रेम को उतारने और नाहक गाने में व्यस्त हो गया.

शोंटू को काफी मज़ा आ रहा था. वो भी नाच रहा था अपने बड़े भाइयों के साथ. प्रतिमा को धीरे धीरे नीचे उतारा गया. ढोल बज रहे थे. नदी का पानी किनारे के पास आ रहा था. कई लोगों ने मीकर प्रतिमा को संभाला हुआ था वो धीरे धीरे उसे नदी की ओर लेकर जा रहे थे. बुम्बा अपने साथियों के प्रतिमा को संभाले हुए था. शोंटू उसके साथ ही धीरे धीरे नदी की ओर बढ़ रहा था. ढोल बज रहे थे, कांसे भी बज रहे थे, सब लोग जोर से  चिल्ला रहे थे " बोलो दुर्गा माई की, जय".  शोंटू भी अपने पूरे दम से चिल्ला रहा था.

प्रतिमा को धीरे धीर पानी में छोड़ा गया. पूरा माहौल नारों से गूँज उठा. जो लोग प्रतिमा को संभालकर नदी में लेकर गए थे वो लोग उठाके आए. बुम्बा ने आकर शोंटू को कंधे पर उठा लिया और दोनों भाई मिलकर नारे लगाने लगे " आसछे बोछोर आबार होबे".
सब लोग ट्रक में चढ़कर वापिस आ गए. कल से वापिस ऑफिस, कॉलेज इत्यादि शुरू होने वाला था. जब मोहोल्ले में लौटे तो वहां भी माहौल थोडा दबा हुआ था. 5 दिन के हंगामे के बाद विसर्जन के दिन वैसे ही सब एकदम सूना सूना लगता है. शोंटू की मम्मी ने पुछा पानी में तो नहीं उतरा था न. ? शोंटू ने नहीं में सर हिलाया. उसको फिर मिठाई दी गयी.

नदी के तट पर सूरज ढलने वाला था. कई मूर्तियाँ पानी में तैर रही थी. लेकिन थोडा ध्यान देने पर दिखाई देता है कि मूर्तियों के साथ कई कम उम्र के बच्चे भी तैर रहे हैं. मूर्तियों में लगे कीमती सामन को वो चुन चुन कर उठाते हैं और उन्हें बेचकर जितना भी पैसा मिलता है उससे 1-2 दिन के लिए कुछ अच्छा खाने-पीने को जुटाते हैं. जब सब लोगों के लिए विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा (या गणेश चतुर्थी) का त्यौहार ख़तम होता है, तो कुछ लोगों को त्यौहार शुरू करने का एक मौका मिलता है. उनका त्यौहार शुरू होगा या नहीं ये इस बात पर निर्भर करता है कि वो विसर्जन के बाद और मूर्तियों के गलने से पहले या फिर किसी और के छीनने से पहले कितना सामान उठा पाते हैं. 

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